कविता १

बाहर की यात्रा खास होने की है
अंदर की यात्रा आम होने की है
सादगी सुकून ही 
अंदर की यात्रा की मंजिल है
कुछ पल खुद के साथ बिताओ
थोड़ा खुद को खोजो
स्वयं को जानो
खुद को पहचानों 

....

याद आते है दिन 
जो तन्हाई मै गुजरे
हम हम न रहें
तुम तुम न रहें
राहे बदल गयी
हम अपनी अपने सफर में बस्स
चलते चले गए 
मुलाकात तो अब यादों में हुआ करती हूं
सुकून के पल जो बिताए थे
खुशियो की बौछार कर गए
आज कल बातें भी हुआ करती है 
जब भी ख़्वाबों में  मुलाकाते हुआ करती है
जब जागते है तो पता चलता है
की ख़्वाब था एक सपना था वो
जो सपना ही रह गया 


सपनों की राह में चलते चलते
कभी सच्चाई से मुह फेर लिया पता भी न चला
बस्स छोटी सी जिंदगी है
जब जागो तब सबेरा 


Vidya
11 oct 2025

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